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    Low Lying Placenta

    'लो-लाइंग' प्लेसेंटा क्या है और उसके बारें में पूरी जानकारी

    Written on 7 January 2019

    जब बच्चा गर्भ में पल रहा होता है तो बॉडी अपनेआप खुद को तैयार करती है. इस दौरान प्लेसेंटा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. ये विकसित होते भ्रूण के चारों तरफ एक प्रोटेक्टिव लेयर होती है. बच्चे को जिन पोषक तत्वों और ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, वे सब इस लेयर के ज़रिए ही पहुंचते हैं.

    जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता है, वैसे-वैसे प्लेसेंटा भी बढ़ने लगता है और यूटरस में मूव होकर भ्रूण को पूरी तरह से कवर कर लेता है. हालांकि, कुछ मामलों में प्लेसेंटा ऊपर की तरफ नहीं जाता है, जिससे जन्म देने वाली नलिका का कुछ हिस्सा भी कवर हो सकता है. यही कंडिशन low lying placenta कहलाती है.

    अगर आप भी मां बनने वाली हैं तो डिलिवरी के वक्त किसी भी तरह के कॉम्प्लीकेशन्स से बचने के लिए आपको इस कंडिशन के लक्षणों को पहचानना ज़रूरी है.

    Low lying placenta क्या होता है?

    प्रेग्नेंसी के दौरान जैसे-जैसे वक्त बढ़ता है, वैसे-वैसे स्ट्रेचिंग यूटरस के साथ प्लेसेंटा भी मूव करने लगता है. कुछ मामलों में, ये सर्विक्स के पास ही रह जाता है. सर्विक्स आपकी डिलिवरी का रास्ता होता है. इसी कंडिशन को low lying placenta या placenta previa कहते हैं.

    प्लेसेंटा अगर यूटरस के नीचे के हिस्से में रह जाता है, तो जोखिम बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि ये सर्विक्स को आंशिक या पूरी तरह से कवर कर सकता है. जिन महिलाओं को plcanta previa होता है उन्हें ज़रूरी इलाज के साथ बेड रेस्ट की सलाह दी जाती है.

    Low lying placenta के लक्षण

    अगर प्रेग्नेंसी के 20वें हफ्ते के बाद वजाइना से भारी ब्लीडिंग होती है तो ये low lying placenta का पहला संकेत है. अगर प्लेसेंटा 20वें हफ्ते तक नीचे की तरफ ही रहता है तो इस कंडिशन को प्लेसेंटा प्रिविया कहते हैं. इसके अन्य लक्षण हैं –

    1. पेट में क्रेम्प्स और तेज दर्द

    2. लंबे अंतराल में ब्लीडिंग शुरू और बंद होना

    3. सेक्सचुअल इंटरकोर्स के साथ ब्लीडिंग होना

    4. मिड-प्रेग्नेंसी में ब्लीडिंग होना

    क्या low lying placenta जोखिम-भरा है?
    Low lying placenta के चलते भारी ब्लीडिंग और सी-सेक्शन का चांस बढ़ जाता है. हालांकि इसकी जोखिम कुछ अन्य कारकों पर भी डिपेंड करती है-

    1. प्लेसेंटा की पॉजिशन

    2. प्रेग्नेंसी का स्टेज

    3. मां और होने वाले बच्चे की सामान्य सेहत

    4. कम या भारी वजाइनल ब्लीडिंग

    5. यूटरस में बच्चे की पॉज़िशन

    Low lying placenta कितनी तरह के होते हैं?
    प्लेसेंटा की पॉज़िशन के आधार पर 4 तरह के low lying placenta या प्लेसेंटा प्रिविया होते हैं-

    1. Partial – इसमें जन्म देने वाली नलिका का कुछ हिस्सा ही ब्लॉक होता है. इस कंडिशन में नॉर्मल डिलिवरी हो सकती है.

    2. Low lying – इस स्थिति में प्लेसेंटा जन्म देने वाली नली के बिल्कुल किनारे पर होता है. इस कंडिशन में भी नॉर्मल डिलिवरी की संभावना होती है.

    3. Marginal – इस कंडिशन में प्लेसेंटा आपकी जन्म नली के सामने से पुश करता है, जिससे ब्लीडिंग होने लगती है.

    4. Major or complete – इस कंडिशन में प्लेसेंटा पूरी तरह से जन्म देने वाली नली को कवर कर लेता है.

    Low lying placenta के कारण

    Low lying placenta के कई कारण होते हैं. यहां देखिए इसके कुछ प्राइमरी कारण-

    1. मां की उम्र 35 से ज़्यादा हो

    2. स्मोकिंग या अन्य किसी तरह की नुकसानदायक आदत

    3. पहली डिलिवरी सी-सेक्शन से होना

    4. एक से ज़्यादा बच्चे जैसे - ट्वीन्स या ट्रिपलेट्स होने से

    5. औरत जो पहले भी माँ बन चुकी हो

    6. पहले भी low lying placenta का होना

    7. Placenta बहुत बड़ा होना. औरत जिसका पहले मिसकैरिज हुआ

    Low lying placenta कैसे निर्धारित होता है?

    आमतौर पर 20वें हफ्ते में अल्ट्रासाउंड करवाने पर low lying placenta के बारे में पता चलता है. प्रेग्नेंसी के शुरुआती हफ्तों में प्लेसेंटा नीचे की तरफ रहना नॉर्मल है, लेकिन अगर 20वें हफ्ते में भी ये नीचे की तरफ रहे तो ये चिंता की बात है.

    आपके बच्चे की पॉज़िशन की जांच करने के लिए एक शारीरिक परीक्षण भी किया जाता है. कुछ low lying placenta मामलों में भ्रूण साइड में हो जाता है.

    Low lying placenta की जांच करने के लिए कौन-से स्कैन करवाएं जाते हैं?

    Low lying placenta के लिए कई तरह के स्कैन होते हैं-

    ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड से प्लेसेंटा की पॉज़िशन के बारे में पता लगाया जाता है. इस प्रोसेस में स्कैनिंग डिवाइस को वजाइना के अंदर रखा जाता है. इस स्कैनिंग में भ्रूण की साफ पिक्चर आती है, जिससे डॉक्टर प्लेसेंटा की पॉज़िशन अच्छी तरह चैक कर सकते हैं.

    ट्रांसएबडॉमनल अल्ट्रासाउंड ये स्कैन सबसे कॉमन है, जिसके बारे में हम सब जानते हैं. इसमें एक हैंड हेल्ड स्कैनर को पेट पर मूव करवाया जाता है. हालांकि ये प्रेग्नेंसी के बाद के स्टेज में काम आता है, जब बच्चा एबडोमन के पास होता है.

    MRI – MRI तब करवाया जाता है जब प्लेसेंटा की पॉज़िशन का सही पता नहीं लगता है. इस स्कैन से प्लेसेंटा की बिल्कुल सही पॉज़िशन का पता चल जाता है और इसकी खास बात ये है कि इसे प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में भी करवाया जा सकता है.

    Low lying placenta का इलाज और केयर टिप्स -

    Low lying placenta का इलाज प्रेग्नेंसी के स्टेज, इस दौरान कितनी ब्लीडिंग हो रही है और मां-बच्चे की सेहत के आधार पर निर्धारित होता है.

    1. अगर हल्की ब्लीडिंग हो रही है तो आपको पूरी तरह से बेड रेस्ट करने और किसी भी तरह की भारी एक्टिविटी ना करने की सलाह दी जाएगी.

    2. अगर थोड़ी भी ज़्यादा ब्लीडिंग हो रही है तो मां को बहुत ध्यान से मॉनिटर किया जाएगा और उन्हें हॉस्पिटल में भी भर्ती करवाया जा सकता है. प्रेग्नेंसी के एडवांस स्टेज में इस कंडिशन में सिज़ेरीयन डिलीवरी की ज़रूरत भी पड़ सकती है.

    3. इससे बचने के लिए बाहर लंबी वॉक ना करें. घर में ही घूमें और अगर आपको बेड रेस्ट की सलाह दी गई है तो घर पर भी कम वॉक करें.

    4. अगर आपको पता चल जाए कि प्लेसेंटा नीचे की तरफ है तो पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान सेक्स करना अवॉइड करें.

    5. आयरन युक्त खाने पर ज़ोर दें और डॉक्टर की सलाह पर आयरन सप्लीमेंट्स भी लें. इससे आपको एनीमिया नहीं होगा.6. अपनी पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान खुश और पॉज़िटिव रहें. Low placenta की वजह से तनाव ना लें. ये आपके और बच्चे के लिए नुकसानदायक

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    sanjurathi85

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