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कैरियोटाइप टेस्ट एक डायग्नोस्टिक टूल है जिसका उपयोग डॉक्टर्स क्रोमोसोम की जाँच और अनालिसिस के लिए करते हैं. यह जेनेटिक डिसॉर्डर के मामलों में प्रयोग किया जाता है. आइये कैरियोटाइप टेस्ट के (Karyotype test in Hindi) बारे में और अधिक जानते हैं.
इस टेस्ट में ब्लड या अन्य कोशिकाओं के सैंपल के द्वारा क्रोमोसोम्स की इमेज को कैप्चर किया जाता है. इन इमेज को एक कैरियोग्राम (karyogram) में व्यवस्थित किया जाता है जिससे एक्सपर्ट्स को क्रोमोसोम्स की संख्या, आकार और संरचना को विजुलाइज करने में मदद मिलती है. इससे क्रोमोसोमल असामान्यताओं का पता लगाने में मदद मिलती है; जैसे कि एन्यूप्लोइडीज़ (aneuploidies) यानी कि क्रोमोसोम्स की असामान्य संख्या या स्ट्रक्चरल दोष. कैरियोटाइप टेस्ट, प्रीनेटल स्क्रीनिंग और कई तरह की जेनेटिक स्टडी में मंहत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
कैरियोटाइप टेस्ट (Karyotype test meaning in Hindi) उन व्यक्तियों के लिए किया जाता है जिनमें क्रोमोसोमल असामान्यताओं का रिस्क होता है; जैसे कि-
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कैरियोटाइप टेस्ट (Karyotype test meaning in Hindi) से कई तरह के क्रोमोसोमल डिसऑर्डर का पता लगाया जा सकता है; जैसे कि -
यह सबसे कॉमन क्रोमोसोमल डिसऑर्डर में से एक है, जो क्रोमोसोम 21 की एक एक्सट्रा कॉपी के कारण होता है और इससे बच्चे के विकास में देरी, इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी जैसे लक्षण दिखते हैं.
क्रोमोसोम 18 की एक एक्सट्रा कॉपी के कारण यह स्थिति होती है जहाँ गंभीर डेवलपमेंटल और फिजिकल एब्नार्मेलिटीज होती हैं, जो अक्सर लाइफ थ्रेटनिंग हो सकती हैं.
ये क्रोमोसोम 13 की एक एक्सट्रा कॉपी से होता है और गंभीर डेवलपमेंटल एब्नार्मेलिटीज के साथ ही ऑर्गन्स में डिफ़ेक्ट भी पैदा कर सकता है.
यह स्थिति उन महिलाओं में होती है जिनमें एक्स क्रोमोसोम गायब या आंशिक रूप से गायब होता है, जिससे छोटा कद, इंफर्टिलिटी और अन्य हेल्थ प्रॉब्लम हो सकती हैं.
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम वाले व्यक्तियों की कोशिकाओं में एक एक्सट्रा एक्स क्रोमोसोम होता है, जो इंफर्टिलिटी समस्याओं का कारण बन सकता है.
ट्रिपल एक्स सिंड्रोम वाली महिलाओं में एक एक्सट्रा एक्स क्रोमोसोम होता है, जिसके कारण शरीर की अभिव्यक्ति और सीखने की क्षमता में अंतर पाया जाता है.
XYY सिंड्रोम वाले पुरुषों में एक अतिरिक्त Y क्रोमोसोम होता है जिसकी वजह से कद असामान्य रूप से लंबा हो सकता है लेकिन इससे किसी अन्य तरह की हेल्थ प्रॉब्लम का खतरा नहीं होता है.
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कैरियोटाइप टेस्ट फर्टिलिटी इशूज की डायग्नोसिस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ख़ासकर तब जब बार-बार गर्भपात हो रहा हो. एक कपल में दोनों के क्रोमोसोम की जाँच करके कैरियोटाइपिंग के ज़रिये क्रोमोसोमल डिसऑर्डर की पहचान की जाती है जैसे महिलाओं में टर्नर सिंड्रोम या पुरुषों में क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम जैसी स्थितियां फर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं. इसके अतिरिक्त, कैरियोटाइपिंग स्ट्रक्चरल क्रोमोसोमल एब्नार्मेलिटीज (structural chromosomal abnormalities) का पता लगा सकती है जो असफल प्रेग्नेंसी या बच्चों में अक्सर जेनेटिक डिसऑर्डर का कारण बनती हैं.
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कैरियोटाइप टेस्ट की अपनी लिमिटेशन भी हैं; जैसे कि-
कैरियोटाइप टेस्ट में कई स्टेप्स होते हैं; जैसे कि-
पेशेंट का एक छोटा सा सेंपल लिया जाता है, जो ब्लड, एमनियोटिक फ्लुइड या बोन मैरो से लिया जाता है.
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सेल डिविजन और मल्टीप्लिकेशन को प्रोत्साहित करने के लिए इस सेंपल को एक ख़ास ग्रोथ मीडियम में रखा जाता है.
जब कोशिकाएँ पर्याप्त बढ़ जाती हैं, तो उन्हें एक कैमिकल के साथ ट्रीट करते हैं जिससे बेहतर विजुलाइजेशन और कैप्चरिंग हो पाए.
प्रत्येक क्रोमोसोम के ख़ास पैटर्न को हाइलाइट करने के लिए इन सेल्स को एक विशेष डाई टेक्निक से कलर किया जाता है.
माइक्रोस्कोप का प्रयोग करते हुए एक अनुभवी साइटोजेनेटिकिस्ट (cytogeneticist) दाग वाले क्रोमोसोम्स को कैरियोग्राम में अरेंज करता है.
साइटोजेनेटिकिस्ट कैरियोग्राम के इंटरप्रिटेशन से क्रोमोसोमल अब्नोर्मेलिटी को चेक करता है.
रिजल्ट्स को एक डिटेल्ड रिपोर्ट में संकलित किया जाता है, जिससे डॉक्टर्स उचित परामर्श दे सकें.
कैरियोटाइप टेस्ट में क्रोमोसोमल असामान्यता कंफर्म होने पर डॉक्टर पेशेंट या फिर प्रीनेटल टेस्टिंग के मामलों में भावी माता-पिता को रिपोर्ट फ़ाइंडिंग्स के बारे में बताते हैं साथ ही, उचित परामर्श भी देते हैं. जेनेटिक डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्तियों को ख़ास तरह से बनाए गए ट्रीटमेंट प्लान लेने की सलाह दी जाती है जिससे उनकी क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार लाया जा सके. यदि कैरियोटाइप टेस्ट में किसी जेनेटिक कंडीशन के दोबारा होने का रिस्क दिखाई दे तो डॉक्टर्स ऐसे कपल को भविष्य में प्रेग्नेंसी से जुड़े रिस्क के बारे में समझने में मदद करता है.
कैरियोटाइप टेस्ट एक ख़ास उद्देश्य से किया जाता है जिसका मकसद पेशेंट और उनके परिवार को गंभीर स्थितियों और होने वाले बच्चे को जेनेटिक डिसऑर्डर से बचाना होता है. इसलिए टेस्ट के रिज़ल्ट्स के आधार पर डॉक्टर्स द्वारा दी गयी सलाह को हमेशा गंभीरता से लें.
रेफरेंस
1. Ozkan E, Lacerda MP. (2022). Genetics, Cytogenetic Testing And Conventional Karyotype.
2. Shemilt L, Verbanis E, Schwenke J, Estandarte AK, Xiong G, Harder R, Parmar N, Yusuf M, Zhang F, Robinson IK. (2015). Karyotyping human chromosomes by optical and X-ray ptychography methods.
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