
प्रेग्नेंसी की शुरुआत में कभी-कभी गर्भ की विकास दर को देख कर यह कह पाना मुश्किल होता है, कि वह कितने समय का है. ऐसा आमतौर पर अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी (early intrauterine pregnancy meaning in Hindi) के दौरान होता है, जब माता-पिता द्वारा बताई गई कन्सेप्शन या गर्भधारण की तिथि गर्भ के आकार से मेल नहीं खाती और डॉक्टर्स गर्भ के सही समय को निर्धारित नहीं कर पाते, तो ऐसी स्थिति में डॉक्टर्स भी प्रेग्नेंसी के समय को सुनिश्चित करने के लिए ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासॉउन्ड की सिफ़ारिश करते हैं. आइए जानते हैं, इस आर्टिकल के ज़रिये अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी के बारे में कि आख़िर यह प्रेग्नेंसी किस कारण से होती है और इसमें किस प्रकार का जोख़िम शामिल होता है.
कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान माँ के गर्भाशय में जेस्टेशनल सैक या गर्भावधि थैली दिखाई देती है, लेकिन भ्रूण का आकार बेहद छोटा होने के कारण वह ठीक से दिखाई नहीं देता. ऐसी प्रेग्नेंसी को अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी भी कहते हैं. दरअसल कई बार गर्भधारण की सही तिथि माँ को भी नहीं मालूम चल पाती, जिसके कारण गर्भ में भ्रूण का जो आकार होता है, वह माँ के द्वारा बताई गई गर्भधारण की तिथि से मेल नहीं खाता और आकार में छोटा दिखता है. इसके अलावा भी एक कारण है, जिसकी वजह से भ्रूण का आकार कन्सेप्शन की तारीख़ से मेल नहीं खाता. कई बार प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में भ्रूण का सही से विकास नहीं हो पता और उसका आकार सामान्य से छोटा होता है. यह भी अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी है.
किसी भी अन्य प्रेग्नेंसी की ही तरह अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी के भी एक जैसे ही लक्षण होते हैं. जैसे कि :
मासिक धर्म का रुकना (Menstrual Period Stop)
कोमल छाती और उसके आकार का बढ़ाना (Tender breast and breast enlargement)
उल्टी, मचली (Nausea)
चक्कर आना (dizzines)
अपच (Indigestion)
बाथरूम का प्रयोग बार-बार करना (frequent urination)
वजाइनल डिस्चार्ज (Vaginal Discharge)
थकावट (Tiredness)
इसके अलावा कुछ महिलाओं को ब्लड स्पॉटिंग या हल्की ब्लीडिंग भी होती है, जिसे इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग के नाम से भी जाना जाता है. साथ ही इस दौर में कुछ गर्भवती महिलाओं को ऐंठन की समस्या भी अधिक होती है.
सबसे पहले तो आप प्रेग्नेंट हैं या नहीं, इसके लिए प्रेग्नेंसी किट के अलावा लैब में ब्लड टेस्ट और/या यूरिन टेस्ट के माध्यम से आपकी प्रेग्नेंसी को सुनिश्चित किया जाता है. इसके बाद डॉक्टर प्रेग्नेंसी के 5-6 सप्ताह में पहला अल्ट्रासाउंड कराने की हिदायत देते हैं. अब अगर डॉक्टर को आपके द्वारा बताई गई कन्सेप्शन डेट और भ्रूण के आकार में कोई अंतर नज़र आता है तो वे ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासॉउन्ड करने की सलाह देते हैं, जिसमें इस बात को भली-भाँति सुनिश्चित किया जाता है कि गर्भाशय में जेस्टेशनल सैक दिखाई दे रहा है, अगर हाँ, तो वह कितने समय का है और उसमें भ्रूण का आकार गर्भावधि के अनुपात में ठीक से बढ़ रहा है या नहीं. इसी अल्ट्रासॉउन्ड के बाद आपकी प्रेग्नेंसी को नॉर्मल या अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी बताया जा सकता है.
आमतौर पर डॉक्टर प्रेग्नेंसी की सही अवधि जाँचने के लिए पहले अल्ट्रासॉउन्ड के बाद एक और अल्ट्रासॉउन्ड करवाते हैं. इन दो अल्ट्रासॉउन्ड के बीच में 7 से 14 दिन का अंतराल होता है. इस दौरान भ्रूण को और विकसित होने का समय मिल जाता है और प्रेग्नेंसी किस सप्ताह में चल रही है, उसका भी सही-सही अंदाज़ लगाया जा सकता है.
सफल इम्प्लांटेशन के रूप में इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी को जाना जाता है. इसका मतलब है कि गर्भवती महिला के गर्भाशय में सही स्थान पर निषेचित अंडा (fertilized egg) इम्प्लांट हो चुका है. एक बार आपकी प्रेग्नेंसी सुनिश्चित हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि इसके कोई जोख़िम नहीं हैं. आइए जानते हैं इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी के रिस्क.
जब गर्भ अपनी अवधि की साथ बढ़ना बंध कर देता है और गर्भपात के लक्षणों के दिखाई देने से पहले ही भ्रूण मर जाता है. ऐसी स्थिति में शरीर भ्रूण को शरीर से बाहर निकाल देता है. यह स्थिति प्रेग्नेंसी के 20 सप्ताह से पहले होती है.
इस स्थिति में इम्प्लांटेशन तो सही से होता है, लेकिन भ्रूण कभी भी आकार लेना शुरू नहीं करता. आसान शब्दों में कहें तो अंडे से भ्रूण नहीं बनता और यह प्रेग्नेंसी सफल नहीं होती.
प्रेग्नेंसी के दौरान जब गर्भ में पल रहे बच्चे की दिल की धड़कन ही नहीं बनती. इसमें मिसकैरेज अकस्मात् या अचानक से नहीं होता.
इस स्थिति में भ्रूण के क्रोमोसोम के दोनों सेट्स, उसे पिता से ही प्राप्त होते हैं. इस कारण से भ्रूण का सही से विकास नहीं हो पाता या भ्रूण अपूर्ण रह जाता है.
गर्भधारण करने के 20 सप्ताह के बाद भी विभिन्न कारणों से प्रेग्नेंसी नहीं रह पाती और बच्चे का सफल जन्म नहीं हो पाता.
इनके अलावा गर्भवती माँ की सेहत भी इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी के जोखिमों का कारण बन सकती है, जैसे कि माँ को मधुमेह या डाइबीटिज़ होना, हॉर्मोन्स का असंतुलन, थाईरॉइड, गंभीर प्रकार के संक्रमण, नशे का सेवन, पहले हुए मिसकैरेज, माँ की उम्र का 35 और उससे अधिक होना आदि.
Mylo की पैरेंटिंग एक्सपर्ट टीम का कहना है कि आपकी प्रेग्नेंसी अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी है या नहीं, यह जानने के लिए डॉक्टर से परामर्श और ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड दोनों ही करवाना आपके लिए ज़रूरी हैं. इसके अलावा अगर आपको प्रेग्नेंसी की शुरुआत में वजाइनल ब्लीडिंग हो या 2-3 दिन से अधिक समय के लिए स्पॉटिंग हो तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए, क्योंकि ये अर्ली इंट्रायूटेराइन प्रेग्नेंसी के असफल होने के संकेत हो सकते हैं.
Yes
No














A journalist, writer, & language expert, Ruchi is an experienced content writer with more than 19 years of experience & has been associated with renowned Print Media houses such as Hindustan Times, Business Standard, Amar Ujala & Dainik Jagran.




Hello friends... Dr ne mujhe bola he 12 april se 15 april tak delivery ho jani chahiye baki bache ko prblm ho sakti he... Par bache ne head niche fix hi nai kra to bachedani ka muh kese khule.. apme koi he jiski sath ye prblm hui ho...!!
Hello mom's mera 6 month chsl rha h kl maine thoda wajan utha liya tha tkriban 10 kg k lgbhg to ky mere bachche ko koi problem to nhi n hogi
Hello moms meri delivery ko 4 month ho gye h mujhe feb me halki bleeding hui thi march me nahi hui fir april me start ho gaye kya ye normal h plzzz reply me
Hello sisters please meri ultrasound report dekhkar bataiye ki sab Kuch hai .... our meri pregnancy ko kitne din ho gay me bahut confused Hu ....mere hisaab se 7th month abhi start hua hai doctor ne Bola hai ki 7 month complete hone wala hai ..... please help me
Hlw mom's Mera baby rat bilkul bhi nahi sota aur din m sota h kyaa kru bhot rota h
Your body needs extra nutrition this trimester - these can help.





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