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    जानिए एक स्त्री के लिए बच्चे को जन्म देना कितना मुश्किल होता है!

    Written on 25 May 2019

    बच्चा पैदा करने के लिए क्या आवश्यक है..??पुरुष का स्पर्म और औरत का गर्भ !!!लेकिन रुकिए ...सिर्फ गर्भ???नहीं... नहीं...!!!एक ऐसा शरीर जो इस क्रिया के लिए तैयार हो। जबकि स्पर्म के लिए 13 साल और 70 साल का स्पर्म भी चलेगा।लेकिन गर्भाशय का मजबूत होना अति आवश्यक है, इसलिए सेहत भी अच्छी होनी चाहिए। एक ऐसी स्त्री का गर्भाशय जिसको बाकायदा हर महीने समयानुसार माहवारी (Period) आती हो। जी हाँ! वही माहवारी जिसको सभी स्त्रियां हर महीने बर्दाश्त करती हैं। बर्दाश्त इसलिए क्योंकि महावारी (Period) उनका चॉइस नहीं है। यह कुदरत के द्वारा दिया गया एक नियम है। वही महावारी जिसमें शरीर पूरा अकड़ जाता है, कमर लगता है टूट गई हो, पैरों की पिंडलियां फटने लगती हैं, लगता है पेड़ू में किसी ने पत्थर ठूंस दिए हों, दर्द की हिलोरें सिहरन पैदा करती हैं। ऊपर से लोगों की घटिया मानसिकता की वजह से इसको छुपा छुपा के रखना अपने आप में किसी जंग से कम नहीं।बच्चे को जन्म देते समय असहनीय दर्द को बर्दाश्त करने के लिए मानसिक और शारीरिक दोनो रूप से तैयार हों। चालीस हड्डियां एक साथ टूटने जैसा दर्द सहन करने की क्षमता से परिपूर्ण हों।गर्भधारण करने के बाद शुरू के 3 से 4 महीने जबरदस्त शारीरिक और हार्मोनल बदलाव के चलते उल्टियां, थकान, अवसाद के लिए मानसिक रूप से तैयार हों। 5वें से 9वें महीने तक अपने बढ़े हुए पेट और शरीर के साथ सभी काम यथावत करने की शक्ति हो।गर्भधारण के बाद कुछ विशेष परिस्थितियों में तरह तरह के हर दूसरे तीसरे दिन इंजेक्शन लगवानें की हिम्मत रखती हों।(जो कभी एक इंजेक्शन लगने पर भी घर को अपने सिर पर उठा लेती थी।) प्रसव पीड़ा को दो-चार, छः घंटे के अलावा, दो दिन, तीन दिन तक बर्दाश्त कर सकने की क्षमता हो। और अगर फिर भी बच्चे का आगमन ना हो तो गर्भ को चीरकर बच्चे को बाहर निकलवाने की हिम्मत रखती हों।अपने खूबसूरत शरीर में स्ट्रेच मार्क्स और ऑपरेशन का निशान ताउम्र अपने साथ ढ़ोने को तैयार हों। कभी कभी प्रसव के बाद दूध कम उतरने या ना उतरने की दशा में तरह-तरह के काढ़े और दवाई पीने का साहस रखती हों।जो अपनी नींद को दांव पर लगाकर दिन और रात में कोई फर्क ना करती हो।3 साल तक सिर्फ बच्चे के लिए ही जीने की शर्त पर गर्भधारण के लिए राजी होती हैं। एक गर्भ में आने के बाद एक स्त्री की यही मनोदशा होती है जिसे एक पुरुष शायद ही कभी समझ पाए। औरत तो स्वयं अपने आप में एक शक्ती है, बलिदान है। इतना कुछ सहन करतें हुए भी वह तुम्हारें अच्छे-बुरे, पसन्द-नापसंद का ख्याल रखती है।अरे जो पूजा करनें योग्य है जो पूजनीय है उसे तुम बस अपनी उपभोग समझते हो। उसके जिंदगी के हर फैशले, खुशियों और धारणाओं पर तुम अपना अंकुश रखकर खुद को मर्द समझते हो। इस घटिया मर्दानगी पर अगर इतना ही घमंड है तुम्हें तो बस एक दिन खुद को उनकी जगह रखकर देखों अगर ये दो कौड़ी की मर्दानगी बिखरकर चकनाचूर न हो जाये तो कहना।याद रखना जो औरतों की इज्ज़त करना नहीं जानतें वो कभी मर्द हो ही नहीं सकतें।??

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    Written by

    Hani

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