
बिहेवियरल और लर्निंग डिसऑर्डर का सामना कर रहे बच्चों के माता-पिता से पूछिए कि क्या उनके बच्चे सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी समस्या से जूझ रहे हैं? फिर इनमें से ज्यादातर "हां" में ही जवाब देंगे। हालांकि आमतौर पर ये माना जाता है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जूझ रहे बच्चे इंद्रियों से जुड़े अहसासों को समझ नहीं पाते हैं। अब इस पर रिसर्च की जा रही है कि जो बच्चे स्पेक्ट्रम पर नहीं हैं, उन्हें भी ये कठिनाइयां कई स्तरों पर महसूस होती है या नहीं।
सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर (एसपीडी) एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। इसमें दिमाग की उस प्रक्रिया पर असर पड़ता है, जिसमें वो इंद्रियों से जुडी जानकारी इस्तेमाल करता है।
प्रभावित होने के आधार पर सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर के शिकार लोग कुछ ज्यादा ही सेंसिटिव हो सकते हैं या फिर ऐसा भी हो सकता है कि वो इंद्रियों से जुड़ी हरकतों पर प्रतिक्रिया ही न दें. इंद्रियों से जुड़ी हरकतों में आपका देखना, सूंघना, स्वाद लेना या फिर छूना शामिल होता है। ये डिसऑर्डर आमतौर पर दिखाता है कि आप कुछ खास बातों के मामले में दूसरों के मुकाबले थोड़े ज्यादा सेंसिटिव हैं।
वयस्कों की तुलना में बच्चों में एसपीडी होने की संभावना ज्यादा होती है। हालांकि, वयस्कों में भी इसके लक्षण होते हैं। आमतौर पर वयस्कों में भी ये लक्षण बचपन से ही होते हैं। वो इस डिसऑर्डर से निपटना सीख लेते हैं और दूसरों से इसे दूर भी रखते हैं। उदाहरण के लिए, इंद्रियों से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रहे बच्चे उन स्थितियों से दूरी बना सकते हैं जो उनकी संवेदनाओं को अत्यधिक उत्तेजित कर देती हैं, जैसे शोर वाला माहौल, तेज रौशनी या तेज महक। या फिर वो संवेदनाओं को पूरी तरह से उत्तेजित न करने वाले माहौल में होने पर थोड़ी और उत्तेजना की तलाश कर सकते हैं।
डॉक्टरों के बीच ये चर्चा होती है कि सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर एक अलग डिसऑर्डर है या दूसरे डिसऑर्डर जैसे स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, हायपरएक्टिविटी, अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर और एंक्जाइटी का लक्षण है। हालांकि इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं या प्रोसेसिंग डिसऑर्डर के बारे में जानकारी अभी थोड़ी ही है जबकि और रिसर्च की अभी और जरूरत है।
सेंसरी प्रोसेसिंग क्या है?
प्राथमिक स्कूल में आपने 5 इंद्रियों के बारे में सीखा होगा लेकिन सच्चाई ये है कि आप अपनी इन 5 इंद्रियों से कहीं ज्यादा महसूस करते हैं।
सेंसरी प्रोसेसिंग को आमतौर पर आठ प्रकारों में बांटा जाता है, जिसमें शामिल है:
· प्रोप्रिओसेपशन: ये जागरूकता का वो "आंतरिक" अहसास है जो आपको अपनी बॉडी के लिए होता है। ये वो है जो आपको पोश्चर और मोटर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, ये आपको बताता है कि आप कैसे चलते हैं और जगह घेरते हैं।
· वेस्टीबुलर: यह शब्द अंदरूनी कान के स्थान की पहचान से संबंधित है। यह आपके संतुलन और समन्वय को बनाए रखने में मदद करता है।
· इंटेरोसेप्शन: ये टर्म आपकी बॉडी में जो कुछ भी हो रहा है उसको समझने से संबंधित है। इसको अच्छे से समझने का तरीका है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं? ये ठंडा, गरम हो सकता है या फिर ये आपकी भावनाएं भी हो सकती हैं।
· पांच इंद्रियां: पांच साधारण इंद्रियां होती हैं, अहसास, सुनना, स्वाद, महक और देखना।
इस डिसऑर्डर के इलाज को साबित करने के लिए रिसर्च में साक्ष्य पूरे नहीं हैं। ज्यादातर डॉक्टर और विशेषज्ञ मानते हैं कि इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं किसी और डिसऑर्डर या स्थिति का असर होती हैं जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर। सेंसरी " ऑक्यूपेशनल प्रोसेसिंग डिसऑर्डर" आमतौर पर ऑक्यूपेशनल थैरेपी में इस्तेमाल किया जाता है।
सेंसरी प्रोसेसिंग की परेशानियों के लक्षण इस आधार पर अलग हो सकते है कि बच्चा अलग-अलग सेंसेशन को कैसे महसूस करता है। उदाहरण के लिए, जिन बच्चों को उत्तेजना बहुत जल्दी महसूस होती है उनमें हायपरसेंसिटिविटी हो सकती है। ये दिखाता है कि वो सेंसरी इनपुट जैसे रोशनी, आवाज और छूने को लेकर ज्यादा सेंसिटिव होते हैं। इसके परिणामस्वरूप ये सेंसेशन उन्हें ज्यादा परेशान कर सकते हैं। इसकी वजह से बहुत ज्यादा सेंसरी इंफोर्मेशन होने पर उनका फोकस कम हो सकता है या फिर वो कोई खास हरकत भी कर सकते हैं।
कुछ बच्चों को हायपोसेंसिटिविटी भी महसूस हो सकती है। ये दिखाता है कि उनमें सेंसरी इनपुट के लिए सेंसिटिविटी काफी कम है। जिस तरह की सेंसिटिविटी कोई महसूस करता है वो दिखाता है कि उनके लक्षण क्या हैं। उदाहरण के लिए हायपरसेंटीविटी वाले बच्चे ऐसा दिखा सकते हैं कि सबकुछ बहुत तेज और चमकदार है। परिणामस्वरुप इन बच्चों को शोर वाली जगह में रहने में दिक्कत हो सकती है और बदबू का भी इनपर असर पड़ सकता है। सेंसरी हायपरसेंटीविटी के निम्न परिणाम हो सकते हैं
· कम दर्द महसूस करना
· बेवकूफ दिखना
· सुरक्षा की चिंता किए बिना भागना
· कान और आंख को अक्सर ढक लेना
· खाने की खास प्राथमिकता या किसी खास टेक्सचर वाला खाना खाने से बचना
· गले लगना या अचानक छूने से बचना
· ये विश्वास कि कोमल छुअन कठोर होती है
· भावनाओं पर नियंत्रण करना कठिन
· ध्यान करने में परेशानी
· प्रतिक्रिया को अपनाने में कठिनाई
· व्यवहार से जुड़ी दिक्कतें
इसके विपरीत, हायपरसेंसिटिव बच्चे सेंसिटिविटी कम महसूस करते हैं और आसपास के लोगों से बातचीत के लिए तरसते रहते हैं। वो ज्यादा सेंसरी फीडबैक पाने के लिए आसपास के माहौल से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं। ये उन्हें हायपरएक्टिव बना सकता है। बल्कि वे अपनी इंद्रियों को ज्यादा व्यस्त रखने की कोशिश करते हैं। सेंसरी हायपरसेंसिटिविटी के निम्न तरह से परिणाम आ सकते हैं:
· अत्यधिक दर्द का अहसास
· दीवार पर सिर भिड़ाना
· चीजों को महसूस करना
· तरह-तरह के सामान मुंह में रखना
· गले लगना
· दूसरे लोगों और चीजों पर झपट्टा मारना
· व्यक्तिगत स्पेस को इज्जत न दें
· हिलना
बच्चों में सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर की वजह क्या होती है, ये अभी भी साफ नहीं है। हालांकि, रिसर्च में ये विश्वास किया जाता है कि इसका ब्रेन सेंसरी पाथवेज से कुछ जुड़ाव है जिसके साथ प्रक्रिया पूरी होती है और जानकारी व्यवस्थित की जाती है। ऑस्टिटिक लोगों में सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी कठिनाइयां ज्यादा होती हैं। हालांकि, ये भी अभी स्पष्ट नहीं है कि इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं अकेले हो सकती हैं या ये किसी और डिसऑर्डर की वजह से होती हैं। मेडिकल कम्युनिटी में ये माना जाता है कि सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी कठिनाइयां निदान से ज्यादा खतरे की निशानी होती हैं।
एक रिव्यू और शॉर्ट स्टडी में सुझाव दिया गया है कि प्रेग्नेंसी और डिलीवरी से जुड़ी परेशानियां सेंसरी प्रोसेसिंग के मामलों से संबंधित हो सकती हैं, जो कि हैं:
· समय से पहले प्रसव
· जन्म के समय कम वजन
· माता-पिता का तनाव
· गर्भावस्था के दौरान एल्कोहल या ड्रग का सेवन
सेंसरी प्रोसेसिंग के विकसित होने के पीछे के जोखिमों में किसी खास केमिकल के संपर्क में आना और बच्चे में संवेदी उत्तेजना की कमी होना भी शामिल है। दिमाग इंद्रियों और उत्तेजना पर प्रतिक्रिया कैसे देता है, इस आधार पर असामान्य ब्रेन एक्टिविटी भी बदल सकती है।
बहुत से डॉक्टर सेंसरी डिसऑर्डर को एक अलग डिसऑर्डर नहीं मानते हैं। लेकिन ये बात भी साफ है कि कुछ लोग जो महसूस करते हैं, देखते हैं, सूंघते हैं, खाते हैं और सुनते हैं, उसे आसानी से प्रोसेस नहीं कर पाते हैं। ज्यादातर मामलों में इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं बच्चों के साथ होती हैं। लेकिन वयस्कों को भी ये महसूस हो सकती हैं। जिन बच्चों की इंद्रियां अलग तरह से काम करती हैं उन्हें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम होता है।
इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं की स्थिति या डिसऑर्डर में शामिल है:
· ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी): ऑटिस्टिक लोग दिमाग के तंत्रिका मार्गों में उतार-चढ़ाव महसूस कर सकते हैं जो इंद्रियों से जुड़ी जानकारी को प्रोसेस करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
· अटेंशन डेफिशिट हायपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी): एडीएचडी इंद्रियों से जुड़ी गैरजरूरी जानकारी को फिल्टर करने की क्षमता पर जोर देता है। जिसके चलते सेंसरी ओवरलोड की समस्या हो सकती है।
· स्किजोफ्रीनिया: इस समस्या से ग्रसित लोगों में दिमाग की इंद्रियों से जुड़े मार्गों में असामान्य तंत्र स्थापित हो जाते हैं। इससे न्यूरॉन के बीच कनेक्शन बनता है। जिसके चलते इंद्रियां और मोटर प्रोसेसिंग अलग तरीके से काम करती है।
· स्लीप डिसऑर्डर: स्लीप डिसऑर्डर जैसे नींद में कमी जिसके परिणामस्वरुप बेहोशी भी हो सकती है। इसके चलते इंद्रियों के काम करने के तरीके में दिक्कत हो सकती है।
· विकास में देरी: इंद्रियों से जुडी समस्याएं होने पर शारीरिक विकास भी देरी से हो सकती है।
· दिमागी चोट: शोधों के मुताबिक, दिमाग पर लगी चोट भी सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर की वजह हो सकती है।
हालांकि, ये ध्यान दिया जाना चाहिए कि इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे बच्चों की तुलना में एडीएचडी से ग्रसित बच्चे कई अलग वजहों से हायपर एक्टिविटी महसूस कर सकते हैं। एडीएचडी से परेशान बच्चे ध्यान क्रेंद्रित करने और एक जगह बैठने में भी दिक्कत महसूस करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे दुनिया के साथ इंद्रियों से जुड़े व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं या फिर ऐसा परिवेश से परेशान होने की वजह से भी हो सकता है।
सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर आधिकारिक तौर पर न्यूरोलॉजिकल दिक्कत नहीं मानी जाती है। इसका मतलब है कि इसके इलाज का कोई खास तरीका नहीं है। इससे इतर, इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं में बच्चों की सहायता करने वाले विशेषज्ञ बच्चे के व्यवहार और दूसरों के साथ बातचीत से बच्चों की मदद करने को सबसे अच्छा तरीका बताते हैं।
इसके साथ ही कुछ मामलों में पेशेवर लोग प्रश्नावली का इस्तेमाल भी कर सकते हैं जैसे सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर टोडलर्स क्विजेज या टेस्ट या सेंसरी प्रोसेसिंग मेजर्स (एसपीएम)। ये टेस्ट बच्चे के इंद्रियों से जुड़ी प्रक्रिया को समझने में हेल्थकेयर प्रोफेशनल और एजुकेटर्स की मदद कर सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे में इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं हैं, तो निम्न लक्षण बताएंगे कि ये समय डॉक्टर से सलाह लेने का है:
· उनके व्यवहार का असर रोजाना की जिंदगी में हो रहा है
· लक्षण बड़े नाटकीय हो गए हैं
· प्रतिक्रियाओं को संभालना बहुत कठिन हो जाए
· इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं व्यवहार में दिखने लगें
डॉक्टर से पूछे जाने वाले सवाल
बच्चे की सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी परेशानी पर डॉक्टर से चर्चा करते हुए बच्चे के व्यवहार पर हर तरह का सवाल पूछें। ये भी बात करें कि आप उनकी मदद कैसे कर सकते हैं। कुछ सवाल जो आप डॉक्टर से जरूर पूछना चाहेंगे, वो हैं:
· क्या ऐसा कोई इलाज है जिससे मेरे बच्चे का व्यवहार स्पष्ट हो सके?
· क्या आप ऐसी कोई थैरेपी बता सकते हैं, जिनसे मदद मिले?
· क्या मेरे बच्चे की सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी परेशानियां उनकी उम्र बढ़ने के साथ खत्म हो जाएंगी?
· मैं अपने बच्चे की घर पर या अलग माहौल में कैसे मदद कर सकता हूं?
· मैं अपने बच्चे की स्कूल में कैसे मदद कर सकता हूं?
· अगर मेरे बच्चे को सेंसरी ओवरलोड का अनुभव हो तो मैं उसकी कैसे मदद कर सकता हूं?
· सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर वाले बच्चे की मैं कैसे मदद कर सकता हूं?
इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं का इलाज क्या है?
इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं या सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर का कोई इलाज नहीं है। फिर भी थैरेपी के कुछ विकल्प मदद कर सकते हैं
1. ऑक्यूपेशनल थैरेपी : ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट बच्चों की उन एक्टिविटी को सीखने या करने में मदद करता है, जिन्हें इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं के दौरान बच्चे करने से बचते हैं। स्कूल में थैरेपिस्ट बच्चों के टीचर के साथ काम करके क्लासरूम में बच्चों की इंद्रियों से जुड़ी समस्याओं में भी मदद कर सकता है।
2. फिजिकल थैरेपी: फिजिकल थैरेपिस्ट सेंसरी डाइट बनाने में मदद कर सकता है।ये सेंसरी इनपुट की इच्छा को संतुष्ट करने की एक्टिविटी लिस्ट है जिसमें जम्पिंग जैक या एक ही जगह पर दौड़ करना शामिल है। अतिरिक्त मदद जैसे वेटेड या सेंसरी वेस्ट या शेड्यूल्ड सेंसरी ब्रेक भी फायदेमंद हो सकते हैं।
3. सेंसरी इंटीग्रेशन थैरेपी: ऑक्यूपेशनल और फिजिकल थैरेपी दोनों ही सेंसरी इंटीग्रेशन थैरेपी का आधार है।इस तरह से बच्चे अपनी इंद्रियों के लिए प्रतिक्रिया देने के तरीके सीख सकते हैं। ये इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वो समझ सकें कि उनके अनुभव कैसे अलग हैं? ताकि वो सही प्रतिक्रिया का अंदाजा लगा सकें।
4. सेंसरी डाइट: अक्सर सेंसरी डाइट दूसरी सेंसरी प्रोसेसिंग थैरेपीज डिसऑर्डर में मदद करती हैं। सेंसरी डाइट आपका नियमित आहार नहीं होता है। इसकी जगह ये घर और स्कूल के लिए सेंसरी एक्टिविटी होती हैं जो आपके बच्चे की पूरे दिन ध्यान केंद्रित करने और व्यवस्थित रहने में मदद करती है। सेंसरी इंटीग्रेशन थैरेपी की तरह सेंसरी डाइट आपके बच्चे की जरूरतों के हिसाब से तैयार की जाती हैं। उदाहरण के लिए स्कूल की सेंसरी डाइट में शामिल हो सकते हैं:
· हर घंटे में वो अवधि जब आपका बच्चा 10 मिनट की वॉक पर जा सके।
· एक दिन में दो बार का वो समय जब आपका बच्चा 10 मिनट के लिए खेल सके।
· काम करते हुए क्लास में हेडफोन की सुविधा ताकि आपका बच्चा म्यूजिक सुन सके।
· क्लास में बैठे हुए बच्चा पैर हिला सके इसके लिए डेस्क चेयर बंजी कॉर्ड की सुविधा।
ये पूरी प्रक्रिया हेल्थ इंश्योरेंस में कवर होती है या नहीं, ये भी एक चिंता का विषय है। जवाब ये है कि अगर बीमारी को ठीक से पहचाना नहीं गया है तो हो सकता है सेंसरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर के इलाज का खर्च इंश्योरेंस में न मिले। इसके लिए अपनी इंश्योरेंस कंपनी से संपर्क करके जानें कि इसमें ऑक्युपेशनल थैरेपी जैसी सेवाएं कवर होती हैं या नहीं। अगर लक्षण थोड़े और गंभीर डिसऑर्डर के हों तो हो सकता है कि आपके बच्चे की इंद्रियों से जुड़ी समस्याएं इंश्योरेंस में कवर हों।ये अच्छा होगा कि आप अपनी इंश्योरेंस कंपनी ये जानकारी ले लें कि वो आपको किस तरह की कवरेज देंगे।
सेंसरी प्रोसेसिंग से जुड़ी दिक्कतों वाले बच्चों का पक्ष लेकर उनके माता-पिता उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं। ताकि बच्चों को उनकी जरूरत के हिसाब से सहयोग मिल सके। इसमें शामिल हो सकता है:
· डॉक्टर या बालरोग विशेषज्ञ से बच्चे की सेंसरी प्रोसेसिंग के बारे में चर्चा करना।
Yes
No














Priyanka is an experienced editor & content writer with great attention to detail. Mother to an 11-year-old, she's a ski
बहुत ही अच्छा लेख है
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