
हमारे शरीर को चलाने में दिमाग़ का बहुत बड़ा रोल होता है. शरीर का हर एक एक्शन दिमाग़ से संचालित होता है. क्या खाना है, क्या पीना है, कहाँ जाना है, और क्या करना है; हर फैसले में दिमाग़ का ही रोल होता है. दरअसल, मस्तिष्क और शरीर, एक तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) के द्वारा जुड़े होते हैं, जिनका काम सूचनाओं का आदान-प्रदान करना होता है. ऐसे में अगर तंत्रिका कोशिका में कोई गड़बड़ी आ जाती है या फिर यह बीमार पड़ जाती है, तो इस स्थिति को मोटर न्यूरॉन बीमारी (Motor Neuron Disease) कहा जाता है.
मोटर न्यूरॉन एक तरह के नर्व्स सेल्स होते हैं, जो मसल्स को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं. अगर ये सेल्स खराब हो जाती हैं तो ब्रेन और स्पाइन की नर्व्स धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं, जिसके चलते नर्व्स सिस्टम बिगड़ जाता है. इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है. आपको बता दें कि मशहूर वैज्ञानिक और ब्लैक होल (Black hole) का रहस्य बताने वाले स्टीफन हॉकिंग (Stephen Hawking) भी इसी बीमारी से पीड़ित थे.
मोटर न्यूरॉन बीमारी किसी भी व्यक्ति को हो सकती है. हालाँकि, अधिकतम मामलों में यह देखा गया है कि 40 की उम्र के बाद इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है और यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों को जल्दी अपनी चपेट में लेती है.
आमतौर पर मोटर न्यूरॉन बीमारी के लक्षण तुरंत समझ में नहीं आते हैं लेकिन कुछ लक्षणों से इस बीमारी का अंदाजा लगाया जा सकता है. ये लक्षण हैं-
मांसपेशियों में दर्द, ऐंठन, मरोड़ महसूस होना
थकान महसूस होना
हाथ-पैरों में कमजोरी महसूस होना. यह कमज़ोरी इतनी बढ़ सकती है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति चल भी नहीं सकता
भावनाओं पर नियंत्रण न होना
साँस लेने या बोलने में परेशानी महसूस होना
जबड़े में दर्द होना
आवाज में बदलाव आना
कुछ भी खाने में दिक्कत महसूस होना
शरीर में लकवा जैसी स्थिति पैदा होने लगती है
वजन कम होना
सोचने-समझने और फैसला लेने में परेशानी महसूस होना
मोटर न्यूरॉन बीमारी आम नहीं है. यह बीमारी 5 प्रतिशत लोगों को ही होती है.
यह बीमारी आनुवांशिक होती है, मतलब कि अगर परिवार में किसी सदस्य को यह समस्या होती है, तो यह समस्या हो सकती है.
इस बीमारी के कई मामले पर्यावरण कारकों पर भी निर्भर होते हैं.
मोटर न्यूरॉन एक लाइलाज बीमारी है, लेकिन इसके बावजूद इसे कुछ हद तक कंट्रोल किया जा सकता है; जैसे कि-
बोलने में दिक्कत होने पर स्पीच थेरेपी ले सकते हैं
खाने और साँस लेने के तरीक़े को नोटिस करने के लिए ब्रिथिंग और फीडिंग डिवाइस की मदद ले सकते हैं.
हाथ-पैरों की मांसपेशियों का ध्यान रखने के लिए फिजियोथेरेपी का सहारा लिया जा सकता है.
पीड़ित व्यक्ति को हमेशा मोटिवेट रखने के लिए सपोर्ट करना
डेली डाइट के लिए डाइट एक्सपर्ट्स की सलाह लेना ज़रूरी होता है.




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